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Lyrical Embroideries

सुमेधा, इस एकांत की ध्वनि, सुनी है तुमने?

चाहत की पुकार सुनी है तुमने?
हाँ वही
जो तुम्हारे तेज़ क़दमों में हिलते
पायल के घुंघरुओं से
ताल के मोती बन
बरखा-सी बरस जाती है।
तो कभी
हवाओं की सरसराहट संग
मुझमें बस जाती है।

चुनरी की कपकपाहट सुनी है तुमने?
हाँ वही
जो तुम्हारी बाहों से लिपटकर
धड़कन-सी धड़क कर
लहराती-बलखाती
तो कभी गंभीर
दुनिया के दो छोर थामे
अम्बर-सी, आँचल बन सहलाती है।

कंगनों की खनक सुनी है तुमने?
वही
जो सरगम को गीतों में बाँध देती है
कभी दिपती, कभी छिपती
इक मुस्कान को आगाज़ की आवाज़ देती है
पुराने बक्से में क़ैद सुरों को, नया साज़ देती है।

झुमकों की झंकार सुनी है तुमने?
ठिठकते-ठहरते
पलटते-बहकते
उनके रंगों में संगीत है
चित्रकार को मोह लें
ऐसी प्रीत है
मचलते मतलों को बांध लें
ऐसे मक़तों की रीत है।

काजल की गहराई में टकराती गूँज, सुनी है तुमने?
जिसमे कड़कती बिजली और गरजते बादलों
की मंशाएं क़ैद हैं
जिसमे बदलती मंज़िलों और बनते-बिगड़ते अरमानों की
आकांक्षाएं क़ैद हैं
वो गूँज जो आँखों की गहराई से बातें करने को मजबूर कर दे
सुनी है तुमने?

जब आती हो तुम
तो मेरे दिल की धड़कन
क़दमों की तेज़ी
सपनों का सितार
झरनों की पुकार
उम्मीद के बंधन
कलम का स्पंदन
चाँद का पिघलना
तारों का मचलना
दीयों का जलना
दो प्रेमी का मिलना
आरोही गीत
वो सत्य अभीत
बेहता समीर
हुआ मन अधीर
– फिर छलकी जाये, स्याही की धार
‘हम’ में सिमटे समस्त संसार…

समस्त संसार
तुम्हारी उठकर झुकती पलकों
और क़दमों की थाप से उठते संगीत
में समा जाता है।
:आदि से अनन्त में
तुम्हारे आने से आये
इस एकांत
की ध्वनि
सुनी है तुमने?

घिर-घिर ध्यान तुम्हारा आया

चन्द्र-किरण-लिपा दरवाज़ा
अरुणिम पूरी अँगनाई
बड़े सवेरे बुलबुल बोली
गूंज गयी शहनाई
भोर किरण क्या फूटी
मेरी निंदिया टूटी
मन ऐसा अकुलाया
घिर-घिर ध्यान तुम्हारा आया।

ठिठक-ठहर रहे पग मन के
सब कुछ सूना-सूना
कह तो दूँ मैं अपना उर,
पर दुःख हो जाता है दूना
एक नज़र क्या अटकी
जाने कब तक भटकी
मन ऐसा घबराया
घिर-घिर ध्यान तुम्हारा आया।

यह बसंत की धुप, ओ साथी!
डगमग-डगमग घूमे
फसलों को चूमे बलखाती
नैनों-नैनों झूमे
यह सन्देश हमारा
अब तक रहा कुंवारा
जो तुमको नहीं पठाया
घिर-घिर ध्यान तुम्हारा आया।

संध्या मधुकलश संग आई
कुछ झिलमिल कुछ बहकी
टप-टप बूँद गिरे आँचल में
रैना प्रेमअगन-सी दहकी
सब घर-आँगन घिरा अँधेरा
इन्द्रियों से टूटा पहरा
मन ऐसा भटकाया
घिर-घिर ध्यान तुम्हारा आया।

गिरहैं – II

हर उधड़ता सिर तुम जोड़ती तो गयी पर जब पलटकर देखता हूँ तो हर जोड़ पर गाँठ दिखाई देती है। तुम तो शायरी लिखती थी। कहते हैं शायर दिल तक झाँक सकता है। आंसुओं में बहते जज़्बात झट से पढ़ लेते हैं। तुमने भी पढ़े होंगे न? उनको पढ़ने की बजाय मांग क्यों नहीं लिया? मैं दे नहीं सकता था, तुम पूछ तो सकती थी।

तुम शायरी और गीतों में अपने प्यार को जीती रही और मैं अपने प्यार में गीत खोजता रहा, जिनके लफ्ज़ तुमसे निकल कर मुझ तक पहुँचते और उनको अपनी धुन के लिबास पहनाकर मैं तुम तक भेज देता।
पर बिना नाप के कैसे बनता लिबास। वो गीत कभी बन ही नहीं पाया।

मैं कहानीकार नहीं हूँ। मेरी सोच इतनी दूर तक नहीं जाती। मैं लम्हों में जी कर लम्हे जितनी कविताएँ बनाता हूँ। कहानी तो ज़िन्दगी की होती है और शायरी लमहों की। पर मेरे लिए शायरी में थोड़ी कहानी और कहानी में थोड़ी शायरी न हो, तो दोनों अधूरे रह जाएंगे न। बस हमारा प्यार भी एक अधूरी कहानी, एक अधूरी कविता की तरह रह गया। खोना नहीं चाहता था तुमको। इतनी जल्दी कैसे खो दूँ इस एहसास को? पर साथ ही साथ कुछ टूट रहा था अंदर! एक डर और कस के कुछ पकड़ लेने का संघर्ष। उन टूटे हिस्सों को उठाने जब-जब झुकता तो एक और हिस्सा टूट के गिर जाता। पर एक छोटे बच्चे की तरह सब कुछ समेट लेना चाहता था मैं। पर हो नहीं पाया ऐसा। होता नहीं है ऐसा।

बचपन की पारियाँ वहीं रहती हैं, साथ नहीं आतीं। किस्से- कहानियां किसी झुर्रियों में, छत पे तकते तारों में, किसी खाट की निवाड़ पर, किसी फटे पुराने गुड्डे के बक्से में क़ैद रह जाते हैं

-तुमसे दूर होकर एहसास हुआ कि ज़िन्दगी की असल कहानी तो कुछ और ही है।

Link to previous part : https://kritantmishra.wordpress.com/2016/12/25/गिरहैं-i/

Featured image courtesy: photographers_of_india instagram handle

गिरहैं – I

हम दोनों, जो कभी अलग-अलग हर्फ़ थे, इक रोज़ मिलकर एक लफ्ज़ बना था। उस लफ्ज़ ने इक अरसे में मायने पाये थे।
फिर जो कुछ गुज़री तो तुम एक हर्फ़ एक खाने में, मैं एक हर्फ़ एक खाने में। बीच में हमारे न जाने कितने लम्हों के खाने खाली हो गए थे।

किसी भँवर में गोता खाते या किसी चट्टान से चिपके, जिन्होंने साहिल देखा ही नहीं, कुछ ऐसा ही नाता था हमारा – बिना साहिल का प्यार। तब तुम बक-बक करती थी अब तुम्हारी खामोशी बक-बक करती है।
तुमको तो चुप करा देता था मगर तुम्हारी ये कमबख्त खामोशी चुप नहीं होती।

बसंत के फूल चुने थे हमने साथ
सावन की झड़ी ने साथ में भिगोया था
गर्मी की लू से एक दुसरे को आँचल में छिपाया था
अबकी बार सर्दियों की रातों में सिर्फ ख़याल ही बचे हैं। तुम उनको सेकना वहां। मैं यहां सेकुंगा।

तुम जिसे प्यार कहती हो, वो प्यार हुआ ही नहीं जीवन में। एहसासों के आसमान में दम भरते प्यार से बहुत छोटा रह गया मेरा प्यार- यहीं, ज़मीन पर ही। एक पूर्ण समर्पित और सम्पूर्णता के दरिया में बहने वाला प्यार। बहते-बहते दरिया के दायरे कब सामने आकर खड़े हो गए, पता ही नहीं चला। लौटना भी मुश्किल था और इतने बड़े दायरे पार कर पाना भी कठिन। उन दायरों के अंदर रहकर भी तुमसे कितना प्यार करूँ, कितना छोड़ दूँ, कभी समझ ही नहीं पाया मैं।
नाप-तोल के कैसे करता मैं प्यार!

तुम्हारा प्यार बांधना नहीं चाहता था, मगर मैं बंधना चाहता था; दायरों में नहीं, तुम्हारे प्यार में।

तुम एहसासों के पंख लगाये आसमान में उड़ती रही। मैं तुम्हारी आसमान से पड़ती परछाई को थामे, दरिया में बेहता रहा। पर जब-जब तूफान आया और मैंने तुम्हारी तरफ देखा, तुम नहीं थीं वहां। तुम्हारी परछाई भी बिखरती रही। मैं समझ नहीं पाया – परछाई भी तो शांत मौजों में बनती है, तूफ़ान में तो साये भी बिखर जाते हैं।
तुम उड़ती रही, आसमानों के दायरे कहाँ होते हैं। मैं आगे कहाँ जाता।
– तुम तैर नहीं पायी, मैं उड़ नहीं पाया।

What do I want to become

The funny thing is I can’t do what I want to today, so that I shall be able to do what I want tomorrow.

But what guarantee do I have of tomorrow? It’s like one huge staircase, leading up into a blanket of fog, I have no idea where it reaches. As a child, when people asked me ‘Beta, what do you want to become?’, I’d have an answer ready, usually deep thought (and some inspiration from books or movies) went into these answers. They came out broken, naive, stuttering.

Today, when people ask me, ‘Beta what do you want to become?’, I have an answer ready on my lips. Well, perhaps three or four answers – different from each other in every way save one; they all continue the world ‘revolutionise’, ‘change’, ‘make a difference’. They sound well thought out, confident, prepared, impressive and noble.

But perhaps they are only words, strung together to the symphony of Impressions. What is my Reality does not want any of these?

What if I just wanted to be selfish, and sit with books, and run away into a magical land upon the unattainable words of another real life person? People bond over dreams, what if I found that I did not have any?

What if for a few moments, I could make myself believe that money was not the most important thing on the planet?

How is it fair that the choices we have to make as 14-15-16-18 year olds, shall dictate our lives? Romeo and Juliet were gyrating about on balconies at this age. Harry Potter was fighting wizards and getting married. MacBeth was probably moping around looking for his toy spear. Alice was going around falling into Wonderlands, and Dorothy was flying about the place. Howard Roark left college, and still became celebrated.

But here we are, waiting, striving, putting one precarious cobblestone after another on a path of tomorrow, that could be cut down by one stroke of Death, Misfortune, or Love, perhaps. Here I am trying to find my vocation, for it has not found me yet.

After Death – Memories and Remnants of Separation

The curious thing about distance is that despite of its ability to just swallow the environment into itself, it too leaves traces though ephemeral. Distance, just like curtain of a stage, opens up time to time, baring the intricate upholstery holding together threads of time.
Within these moments of vulnerability, we may chance upon the unexpected things that might have been forgotten, details that might have gone amiss. Things that are so far removed from their natural habitat that they now distinctively stand out in place of non belonging – like these passport sized photographs, handwritten notes, letters and sindoor of my grandmother who passed away.
The beauty of these things are no longer camouflaged in a surrounding of sameness. They now become portals. They adopt a sudden transportive quality of time wearing it as a badge of honour. A testament to another place, another time, seemingly out of place but comforting as a memory and disheartening as a remnant of separation.
When someone leaves your life, it’s not as if they disappear completely. They linger, they remain but most importantly they leave a person shaped void inside your heart which is difficult to fill by anyone else.
You see their clothes, shoes, files, papers, combs that still hold their tangled hair. Yes, sindoor as in my case, half remaining in the container. You eat the food they used to love, listen to songs they used to sing. You try to fill the gap they have created being integral part of your life. But there is always that distance with inbuilt impasse. The fine line of mortality separates us from them.
But, what if you succeed in keeping a lively tangible part of them, as though their essence still prevails. At once, the fact that essence can be felt not touched and seen comes to mind.
That’s when you begin to embrace memories. That’s when you realise the stringent laws of nature based on mortality of each being. That’s when you understand love and care. This is how you look at the other side of death and appreciate the quote, “Death ends a life, not a relation.” That’s when gratitude overcomes grief towards the person who made you realise the very fact that life is not just the mechanical cycle of birth and death but a lot more to cherish in between.

Vandita, I Wish!

I wish the glow of your cheeks last, like the crimson sky opening up to shaded sunshine.

I wish the red of your bindi stays, like your thought clouds in my head, on every Rakshabandhan.

I wish the black of your heels stand tall when you dance around carefree, wiping away layers of blue from your life.

Like the way how your hair sway around as you fail to clutch them together in your orange hairband.
Or like the way you kajal broadens your eyes to beautify this universe.

In the opposite corners of the world we are
But I love how these colours keep memories and wishes alive.

एक थी राधा, एक थी मीरा – राधा-मीरा संवाद

दृश्य :
जब कृष्ण राधा को वृन्दावन में छोड़ जाते हैं तब विरह-अग्नि में जलती राधा उन्हें ढूँढने निकल पड़ती हैं । उन्हें कृष्ण की बात याद आती है, वे अंतर्यामी हैं, उन्होंने बताया था, “कलियुग में मीरा मेरी भक्त के रूप में जन्म लेंगी । मैं सदैव तुम्हें उनके हृदय में मिलूंगा ।” मिलन की चाह में राधा अपनी गति को भूल समय-चक्र से आगे निकल आती हैं ।
चलते-चलते उन्हें कृष्ण-भक्ति में लीन एक जोगन दिखाई देती है । वे समझ जाती हैं कि ये मीरा हैं । और यहां प्रारम्भ होता है – ‘राधा-मीरा संवाद’ :

राधा : वह शशिहीन थी एक रात
जिसमें बसता था प्रणय-प्रात
बिखरे-बिखरे तारे झलमल
खिलता नदिया में चंद्रकमल ।

पवन बह रही सर् -सर् -सर्
ज्वार में आता रक्त-भंवर ।

चुपचाप खड़ी हैं वल्लरियाँ
मुस्काई धीमे नवकलियाँ ।
धूमिल छायाएं रहीं घूम
मेरी पायल को रहीं चूम ।

मैं चली आयीं हूँ दूर यहां
श्यामल बेला बिसरी वहां ।
मीरा मन-मन्दिर मिला यहां
कान्हा बसते हैं स्वयं जहां ।

मीरा : राधा तुम हो कितनी उदार
मेरा मन है उन्मुक्त द्वार ।

यह लोचन-गोचर-सकल-लोक
मोहन से कल्पित हर्ष-शोक ।
राधे तुम क्यों होती उदास
कान्हा के संग हो रचती रास ।

मैं तो हूँ मोहन की जोगन
मैं भक्त, समर्पित तन-मन-धन ।

राधा : जब गोविन्द को निकट न पाती हूँ
अपने को नहीं सुहाती हूँ ।
जो कुछ भी स्वर में गाती हूँ
मैं स्वयं नहीं सुन पाती हूँ ।

दें प्रेम, न दें अपना विराग
सोई चेतनता उठे जाग ।

मोहन संग जीवन चाहती हूँ
उन्हें भुला न पाती हूँ
मैं उन्हें भुला न पाती हूँ ।

मीरा : हे राधा!
मोहन तो कण-कण में हैं
बीते-आते हर क्षण में हैं ।
वे कुरुक्षेत्र के रण में हैं
गोकुल के हर इक तृण में हैं ।

प्रेयसि के परिचय में हैं
इस जोगन के दृढ़-निश्चय में हैं ।

गोविंद हैं राधा –

वे स्वप्नों से झांकते हैं
प्रेम को खंघालते हैं ।

तारों से तकते हैं
दीपों में जलते हैं ।

खुशबू में लिपटे हैं
फूलों में छिपते हैं ।

यमुना में बहते
और धीमे से कहते हैं
-‘मीरा, मैं हूँ!’

वे गीतों के आलाप में हैं
तबले की थाप में हैं ।
मोरनी की चाल में हैं
सोने की थाल में हैं ।
माखन के प्यालों में हैं
बीते हुए सालों में हैं ।
झनकार में और ताल में हैं
हर इक ख्याल में हैं ।

-बाग में हैं, फाग में हैं
राधा के अनुराग में हैं
राधा के अनुराग में हैं ।

गोविन्द हैं राधा ।

राधा : गर मैं मूरत अनुराग की
तुम गिरधर में विश्वास की ।

तृष्णाओं को जो लांघ गयी
इक बात आज मैं जान गयी
: सुख-दुख जीवन में सब सहते
पर केवल सुख अपना कहते
दुख का अर्थ न समझ सके
हम मोह के धागों में रहते ।

क्या नारी-जीवन सतत् प्रवाह?
क्या प्रेम का है ध्येय विवाह?

मीरा : हम हँसती हैं रो लेती हैं
हम पाती हैं खो देती हैं
हम विरह-अगन में प्रेम-लगन से
दुख को सुख कर लेती हैं ।

नारी ममता-प्रेम का बल
हम गरिमामयी छाया शीतल
सर्वस्व वार दें हम निश्छल
इस प्रेम से धन्य बने भूतल ।

न बंधन में यह बंधता है
कोई बाँध सके, न क्षमता है
नर-नारी-कण-युग-दिशि-पल में
प्रेम, बिखरता और निखरता है ।

दृश्य : अचानक समय रुक जाता है – पंछियों का चहचहाना, बहती पवन, गिरते झरने, मचलते वृक्ष, राधा-मीरा का संवाद -सब कुछ । समूचे आसमान में शंख की ध्वनियाँ गूंजने लगती हैं I केसरिया अम्बर से लहराता पीताम्बर धरती पर उतरता है । बंसी की धुन और नीली-सुनहरी रौशनी के बीच से कृष्ण प्रकट होते हैं ।

कृष्ण : मीरा का था स्वप्न किन्तु मैं सत्य कहलाया
विरह-वेदना में राधा ने प्रेम को पाया ।
मैं चिर्-बंधन, अजर, अमर हूँ, प्रेम-दर्शन
कोटि-कोटि नक्षत्रों का मैं हूँ स्पंदन ।

गर आशा में विश्वास, श्वास में ताप भरा हो
प्रेम हिलोरे लेता हृदय में झूम रहा हो
-समझो प्रिय कि बंसी के स्वर बिखर गए हैं
मोर-पंखी के रंग वो सारे निखर गए हैं
अब अंतर्-मन में, ये कृष्ण तुम्हारे, रास रचेगा
~राधा-से तुम मृदुल बनोगे
मीरा-से तुम निश्छल
गीता-से पावन भी होगे
यमुना-से तुम शीतल~
परम-आत्मा से मिलने का संगीत बजेगा
अंतर्-मन में कृष्ण तुम्हारे, रास रचेगा
अंतर्-मन में, ये कृष्ण तुम्हारे, रास रचेगा ।

वैसी मोहब्बत

कैसी मोहब्बत?

जैसी यादों को होती है
भूले बिसरे कल से
समझौते को होती है
भरोसे के बल से
सागर मचल उठता है
जैसे पूनम के चाँद को देख
वैसी मोहब्बत !

बहती पवन के झोंके
बालों को जैसे चूम लेते हैं
हाथों में हाथ हों, तो आँखें मूँद
सारा जहान् घूम लेते हैं
बातें सारी हो जाएं
जैसे इशारों-इशारों में
वैसी मोहब्बत !

जैसी वक़्त को होती है
गुज़र जाने से
तस्वीरों को होती है
किसी अफ़साने से
गुस्ताखियाँ ख़ुद-ब-ख़ुद होकर
जैसे मनाये जाने के इंतज़ार में हों
वैसी मोहब्बत !

जैसी मेहँदी को होती है
पीले हाथों से
और रिश्तों को होती है
चन्द मुलाक़ातों से
संगीत सुनाई देते ही
जैसे गुनगुनाना रोक नहीं पाता मैं
वैसी मोहब्बत !

– कृतांत

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